जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच, वैश्विक स्तर पर जलवायु वित्तपोषण का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। इस वर्ष के अंत में अज़रबैजान के बाकू में होने वाले COP29 शिखर सम्मेलन से पहले, देश जलवायु वित्त के नए सामूहिक परिमाणीकृत लक्ष्य (New Collective Quantified Goal - NCQG) को लेकर गहन वार्ताओं में जुटे हैं। यह लक्ष्य विकासशील देशों के लिए जलवायु कार्रवाई हेतु आवश्यक वित्तीय सहायता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत सहित कई विकासशील देशों के लिए यह वार्ता बेहद अहम है, क्योंकि उनके लिए अनुकूलन और शमन प्रयासों को गति देने के लिए पर्याप्त और सुलभ वित्तपोषण अनिवार्य है।
जलवायु वित्त का नया लक्ष्य (NCQG) क्या है?
NCQG एक नया वित्तीय लक्ष्य है जिसे 2025 से आगे के लिए निर्धारित किया जाना है। यह 2009 में कोपेनहेगन में विकसित देशों द्वारा किए गए उस वादे का स्थान लेगा, जिसमें उन्होंने 2020 तक विकासशील देशों को प्रति वर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रदान करने का संकल्प लिया था। हालाँकि, यह लक्ष्य अक्सर पूरा नहीं हो पाया और इसकी प्रकृति (ऋण बनाम अनुदान) पर भी सवाल उठते रहे। NCQG का उद्देश्य एक ऐसा नया, अधिक महत्वाकांक्षी और पारदर्शी लक्ष्य स्थापित करना है जो विकासशील देशों की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सके।
इस नए लक्ष्य की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तेजी से बढ़ रहे हैं, और विकासशील देशों को इनसे निपटने के लिए कहीं अधिक संसाधनों की आवश्यकता है। विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें बताती हैं कि इन देशों को केवल अनुकूलन के लिए ही प्रति वर्ष सैकड़ों अरब डॉलर की जरूरत है, जबकि शमन प्रयासों के लिए यह राशि खरबों में हो सकती है। NCQG केवल राशि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वित्तपोषण के स्रोत, प्रकृति (अनुदान, ऋण, इक्विटी), पहुंच और वितरण के तरीके भी शामिल होंगे।
विकासशील देशों की अपेक्षाएं और भारत का रुख
विकासशील देश, विशेष रूप से छोटे द्वीप राष्ट्र और सबसे कम विकसित देश, NCQG से एक महत्वपूर्ण वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि नया लक्ष्य 100 बिलियन डॉलर से काफी अधिक हो – कुछ अनुमानों के अनुसार प्रति वर्ष 1 ट्रिलियन डॉलर तक। उनकी मुख्य मांगें हैं:
- नई और अतिरिक्त निधि: यह वित्तपोषण मौजूदा विकास सहायता के अतिरिक्त होना चाहिए, न कि उसका पुनर्गठन।
- अनुदान-आधारित वित्तपोषण: ऋण के बजाय अनुदान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि विकासशील देशों पर ऋण का बोझ न बढ़े।
- अनुकूलन और हानि एवं क्षति पर जोर: शमन के साथ-साथ अनुकूलन और जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान (हानि एवं क्षति) के लिए भी पर्याप्त वित्तपोषण सुनिश्चित किया जाए।
- सरल पहुंच: विकासशील देशों के लिए वित्त तक पहुंच को आसान बनाया जाए और नौकरशाही बाधाओं को कम किया जाए।
भारत, एक प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में, इस मुद्दे पर एक मजबूत और स्पष्ट रुख रखता है। भारत 'समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं' (Common But Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities - CBDR-RC) के सिद्धांत पर जोर देता है। इसका अर्थ है कि विकसित देशों को ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए और विकासशील देशों को जलवायु कार्रवाई के लिए समर्थन देना चाहिए। भारत का तर्क है कि NCQG को विकसित देशों द्वारा सार्वजनिक वित्त के रूप में प्रदान किया जाना चाहिए और यह पारदर्शी, अनुमानित और मापनीय होना चाहिए। भारत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि जलवायु कार्रवाई का बोझ विकासशील देशों पर अकेले नहीं पड़ना चाहिए, बल्कि यह वैश्विक सहयोग का परिणाम होना चाहिए।
विकसित देशों की प्रतिबद्धताएं और चुनौतियां
विकसित देश भी जलवायु वित्त के महत्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन वे अक्सर अपने लक्ष्यों को पूरा करने में चुनौतियों का सामना करते हैं। 100 बिलियन डॉलर के लक्ष्य को भी कई बार पूरा नहीं किया जा सका, और जब किया गया, तो इसमें अक्सर ऋण या निजी निवेश शामिल था, जिसकी प्रकृति को लेकर विवाद रहा। विकसित देश अक्सर निजी क्षेत्र के निवेश को जुटाने पर जोर देते हैं, जबकि विकासशील देश सार्वजनिक और अनुदान-आधारित वित्त को प्राथमिकता देते हैं।
इसके अतिरिक्त, विकसित देशों के भीतर भी आर्थिक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव और घरेलू प्राथमिकताओं के कारण जलवायु वित्त पर खर्च बढ़ाने में हिचकिचाहट देखी जाती है। वे अक्सर इस बात पर भी बहस करते हैं कि 'जलवायु वित्त' में क्या शामिल होना चाहिए और इसके मापन के तरीके क्या होने चाहिए। इन वार्ताओं में विकसित देशों को एक अधिक महत्वाकांक्षी और विश्वसनीय लक्ष्य पर सहमत होने के लिए राजी करना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है।
त्रिपुरा और सीमावर्ती क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव
अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्तपोषण का सीधा संबंध भारत के राज्यों, विशेषकर जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील राज्यों से है। त्रिपुरा, जो बांग्लादेश के साथ एक लंबी सीमा साझा करता है और प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, चक्रवात और सूखे के प्रति संवेदनशील है, के लिए पर्याप्त जलवायु वित्तपोषण महत्वपूर्ण हो सकता है। NCQG के तहत मिलने वाला धन राज्य को इन आपदाओं से निपटने, अनुकूलन रणनीतियों को लागू करने और हरित विकास को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।
उदाहरण के लिए, अगरतला और आसपास के सीमावर्ती जिलों में, जलवायु परिवर्तन से कृषि पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने, जल प्रबंधन प्रणालियों को बेहतर बनाने और तटीय/नदी तटीय समुदायों को लचीला बनाने के लिए परियोजनाओं को वित्तपोषित किया जा सकता है। यह वित्तपोषण सौर ऊर्जा परियोजनाओं, टिकाऊ कृषि पद्धतियों और आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के विकास को गति दे सकता है। सीमावर्ती क्षेत्रों में, जहां अक्सर साझा पारिस्थितिकी तंत्र और जल संसाधन होते हैं, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वित्तपोषण से सीमा पार जलवायु अनुकूलन पहल को भी बढ़ावा मिल सकता है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता में वृद्धि होगी।
आगे की राह और कूटनीतिक प्रयास
COP29 से पहले के महीनों में NCQG पर वार्ताएं और तेज होंगी। यह आवश्यक है कि सभी पक्ष एक साझा समझ तक पहुंचें और एक ऐसा लक्ष्य निर्धारित करें जो महत्वाकांक्षी, न्यायसंगत और क्रियान्वित करने योग्य हो। भारत जैसे विकासशील देशों को अपनी मांगों को मजबूती से रखना होगा, जबकि विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को पहचानते हुए ठोस प्रतिबद्धताएं करनी होंगी।
जलवायु कूटनीति में पारदर्शिता, विश्वास और सहयोग महत्वपूर्ण हैं। NCQG केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह वैश्विक जलवायु न्याय और सतत विकास के लिए एक आधारशिला है। इस लक्ष्य की सफलता यह निर्धारित करेगी कि क्या दुनिया जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों को प्रभावी ढंग से कम कर पाएगी और सबसे कमजोर समुदायों को अनुकूलन के लिए सशक्त कर पाएगी।
निष्कर्ष
जलवायु वित्त का नया सामूहिक परिमाणीकृत लक्ष्य (NCQG) वैश्विक जलवायु कार्रवाई के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। COP29 में होने वाले निर्णय विकासशील देशों की क्षमता को आकार देंगे कि वे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कितनी प्रभावी ढंग से लड़ सकते हैं। भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि यह लक्ष्य उनकी वास्तविक जरूरतों को पूरा करे और एक न्यायसंगत, टिकाऊ और लचीले भविष्य की ओर मार्ग प्रशस्त करे।










